बौद्धिक शिक्षा के विकास के साथ जरूरी नैतिक एवं भावनात्मक विकास : आचार्य महाश्रमण प्रवचन विडियो २१.०४.१२


आसोतरा (राज.). दि. २१ अप्रैल, २०१२. द्वारा- संजय मेहता
आचार्य महाश्रमण ने आज आसोतरा में अपने प्रवचन में फरमाया -"नयी पीढ़ी में बौध्धिक विकास के साथ नैतिक एवं भावनात्मक विकास भी हो. उन्होंने जैन आगमो का सन्दर्भ देते हुए कहा - अर्हत वांग््मय  में सूत्र आता है – ‘अप्पणा सच्च मेसेज्जा’ अर्थात मनुष्य को स्वयं सत्य की खोज करनी चाहिए. विधालयो-महाविद्यालयो में अनेको खोज शोध चलती है. उनमे शिक्षा ग्रहण करने वाले विद्यार्थी करियर बनाने की योजनाए बनाते है. Career के बारे में सोचना आवश्यक है तो अध्यात्म के प्रति Carefulness  का विकास होना चाहिए . दोनों के बारे में सोचना अपेक्षित है. जीविका का चिंतन बुरा नहीं है उसके बिना काम नहीं चलता. पैसे के बारे में सोचना गृहस्थ के लिए कोई बुरी बात नहीं है. लेकिन जीवन कैसे अच्छा बने यह लक्ष्य भी शिक्षा के द्वारा पूरा होना जरूरी है. हमारे  में नैतिकता के प्रति निष्ठां पुष्ट कैसे हो? प्राणी मात्र से मैत्री कैसे हो?  इमानदारी कैसे बनी रहे ? इन सब के प्रति भी जागरूकता (Carefullness) बढे. पूज्य आ. तुलसी एवं पूज्य आ. महाप्रज्ञजी ने शिक्षा जगत को ‘जीवन विज्ञान’ (Science of Living) का उपहार दिया. जीवन विज्ञान का यही लक्ष्य है कि नयी पीढ़ी में बौध्धिक विकास के साथ भावनात्मक विकास भी हो.   बुद्धि के साथ शुद्धि भी हो. शुद्ध बुद्धि कामधेनु होती है.  बुद्धि के साथ मोह, क्रोध, अहंकार जुड़ने पर बुद्धि अनिष्ट कर सकती है. हम यह जागरूकता रखे कि हम बुद्धि का योग इन सब चीजों के साथ ना होने दे एवं बुद्धि का सदुपयोग हो. विद्यार्थी नशामुक्त रहे ताकि बुद्धि की शुद्धि बनी रहे.  नशे से शारीरिक, मानसिक, आर्थिक के साथ साथ आध्यात्मिक अर्थात की आत्मा का भी नुकसान होता है. नशे में पापाचार करने से कर्म बंधन हो सकता है. विद्यार्थियों में अहिंसा का विकास हो, परस्पर मैत्री का विकास हो.


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