राष्ट्र निर्माण में अणुव्रत की भूमिका महत्वपूर्ण : आचार्य महाश्रमण प्रवचन २५.०४.१२

बालोतरा. २५.०४.२१२.
 आचार्य महाश्रमण जी के ५०वे जन्मोत्सव उपलक्ष्य आयोजित अमृत महोत्सव का चतुर्थ चरण आज से बालोतरा में आरम्भ हुआ. राष्ट्र निर्माण में अणुव्रत की भूमिका विषय पर अपने प्रवचन में आचार्य श्री ने फरमाया कि आदमी का व्यवहार धर्मयुक्त होना चाहिए. व्यवहार पवित्र तब होता है जब भाव पवित्र होता है. भाव मलिन तो व्यवहार मलिन. भावो को शुद्ध निर्मल बनाने का प्रयास हो. आज हम राष्ट्र निर्माण में अणुव्रत की भूमिका के विषय पर चर्चा कर रहे है. परम पूज्य गुरुदेव तुलसी का मानव हितकारी आंदोलन था अणुव्रत  आंदोलन. अगर अणु व्रत की अनुपालना सम्यक होती है तो राष्ट्र का सर्वांगीण विकास हो सकता है. राष्ट्र निर्माण के लिए चार तरह के विकास आवश्यक है - भौतिक विकास, आर्थिक विकास, नैतिक विकास, आध्यात्मिक विकास. भौतिक एवं आर्थिक विकास के बिना राष्ट्र सदृढ़ नहीं हो सकता. लेकिन नैतिक मूल्यों के विकास के बिना एवं आध्यात्मिक विकास के बिना सर्वांगीण विकास नहीं हो सकता. यदि राष्ट्र में भ्रष्टाचार हो, काले धन की अधिकता हो, लोग व्यसन करते हो, मूल्यों-संस्कारों का ह्रास हो तो विकास किसी संभव है. नैतिक चेतना के जागरण में, व्यसन मुक्ति की चेतना जागरण में अणुव्रत की भूमिका बड़ी ही महत्वपूर्ण है. अहिंसा यात्रा के दौरान भी नशा-मुक्ति का कार्य सुव्यवस्थित चल रहा है. अणुव्रत संयम की बात करता है, उपभोग की सीमा करने के लिए कहता है. पानी- बिजली या अन्य प्राकृतिक संसाधन हो, इनके उपभोग के संयम से इनकी कमी की समस्या से निपटा जा सकता है. इमानदारी की प्रेरणा अणुव्रत  देता है, इससे भ्रष्टाचार की वृत्ति कम करने का प्रयास हो रहा है.  द्वारा- संजय मेहता, रोशन जैन

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