खुद के भीतर झांकें : आचार्य महाश्रमण प्रवचन ०४.०५.१२


बालोतरा. आचार्य महाश्रमण ने कहा - आदमी की प्रवृत्ति होती है कि वह खुद के नहीं, दूसरों के दोष अधिक देखता है। उसे स्वयं की दुर्बलता का अहसास भी हो जाए तो जैसे-तैसे ढांकने का ही प्रयास करता है। चिंतन का यह कोण इस रूप में परिवर्तित हो जाए कि मुझे कोई दूसरा देखे या न देखे, मैं स्वयं अपने आचरण के प्रति जागरूक रहूं तो यह आत्मदर्शन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। आत्मदर्शन की इस प्रक्रिया को अपनाने वाले व्यक्ति की जीवन-पोथी का हर पृष्ठ उजला बन सकता है।

एक महात्माजी बहुत ज्ञानी, साधक और अंतर्मुखी थे। वे अपनी साधना में ही लीन रहते। उन्होंने वृद्धावस्था को देखते हुए एक लड़के को चेला बना लिया। चेले का मन ज्ञान-ध्यान में नहीं लगता। गुरु ने कई बार उसे ज्ञान, ध्यान, सेवा आदि में लगाने का प्रयत्न किया पर सफलता नहीं मिली। एक दिन चेला बोला-गुरुदेव, मुझे कोई चमत्कार सिखा दें। गुरु के बहुत समझाने पर भी वह अड़ा रहा। अंतत: गुरु ने झोले से एक पारदर्शी डंडा निकाला। चेले के हाथ में उसे थमाते हुए कहा कि यह लो चमत्कार। इस डंडे को तुम जिस किसी के सामने करोगे, उसके दोष इसमें प्रकट हो जाएंगे। डंडा पाने के बाद आश्रम में कोई भी आता वह उसके सामने उस डंडे को घुमा देता। फलत: उसकी कमजोरियां उस डंडे में प्रकट हो जाती और चेला उनका दुष्प्रचार शुरू कर देता। बेचारे लोग शर्मिन्दा हो जाते।

एक दिन गुरुजी सो रहे थे। चेले के मन मे आया कि क्यों नहीं गुरुजी के दोष देखूं? डंडा सामने करते ही गुरुजी के भीतर क्रोध, मान, माया, लोभ के जो कुछ अंश बचे थे, वे उसमें प्रकट हो गए। गुरु के उठते ही उसने कहा आज तक मैं आपको दोष मुक्त समझता रहा था। आप में भी क्रोध, अभिमान, ईष्र्या, द्वेष, घृणा, माया व लोभ है। गुरुजी ने कहा कि चेले, तुम्हारी बात सवा सोलह आना सही है। मैं भी पूरी तरह से इनसे मुक्त नहीं हो सका हूं। किंतु दूर करने की कोशिश में अवश्य हूं। तुम जाना चाहते हो तो खुशी से जाओ पर जाने से पूर्व एक डंडा अपनी ओर घुमा कर देख लो। चेले ने डंडा अपनी ओर किया तो देखा कि उसके भीतर दोषों का अंबार लगा है। शर्म से उसका मुंह नीचा हो गया। गुरु ने शांत भाव से कहा कि अब मेरे दोषों से तुम अपने दोषों की तुलना करो। शिष्य ने अपने दोषों की ओर दृष्टि घुमाई तो आंखें फटी सी रह गई। वह गुरु के चरणों में गिर पड़ा और अपनी भूल की क्षमा मांगते हुए कहा कि आज से अपने ही दोष देखने का प्रयास करूंगा।

वस्तुत: अपने दोषों को देखना, अपनी कमजोरियों को पहचानना बहुत बड़ी बात है। जब तक बुराई का अहसास नहीं होता, वह छूट नहीं सकती। व्यक्ति तटस्थ और निष्कपट भाव से आत्म प्रेक्षा करे कि मेरे भीतर क्या-क्या बुराइयां है? मुझमें अहंकार कितना है? अनावश्यक बोलने की आदत कितनी है? प्रमाद कितना करता हूं? जब इनसे परिचय हो जाए तो इन्हें छोडऩे का संकल्प लें। सब बुराइयों को एक साथ न छोड़ सकें तो उसके लिए क्रमिक अभ्यास करें।