आचार्य महाश्रमण ३९वा दीक्षा दिवस मना युवा दिवस के रूप् में

बालोतरा.
जैन धर्म तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण ने कहा कि व्यक्ति धन्य होता है जो यथार्थ के धरातल पर अपने आपको श्रमण के रूप में अनुभव करता है, जो दीक्षित हो जाता है व श्रमण बन जाता है। उन्होंने कहा कि मेरे लिए आज का दिन महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के दिन ही मैंने परम कल्याणकारी स्थान को प्राप्त किया था। मेरी संसार पक्षीय मां ने मुझे साधु-साध्वियों के पास ले जाने का क्रम शुरू किया था। ये उद्गार आचार्य ने नया तेरापंथ भवन में शनिवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहे।

आचार्य ने कहा कि मुनि सुमेरमल का इस रूप में मेरे ऊपर एक महान उपकार है कि संसार में भ्रमण करते हुए बालक को उन्होंने तारने का प्रयास किया। उन्होंने कहा परमपूज्य गुरूदेव महाप्रज्ञ का सानिध्य मुझे मिला। वे एक जागरूक महात्मा थे। गुरूदेव महाप्रज्ञ ने मुख्य रूप से मुनि योगेश को मेरी परिचर्या से जोड़ा था।

शक्ति का हो सम्यक नियोजन: दीक्षा दिवस जो युवा दिवस के रूप में निर्णीत है, के संदर्भ में आचार्य ने कहा कि युवा अपनी शक्ति की पहचान करें और पवित्र रचनात्मक कार्यों में शक्ति के प्रयोग का प्रयास करे तो युवा अपने में बहुत सफल हो सकता है। आचार्य ने कहा कि मैं स्वयं युवा अवस्था में हूं।

इसलिए युवाओं के साथ मेरा अवस्था का भी संबंध है। युवाओं में युवकत्व का अच्छा उपयोग हो। ऐसा चिंतन युवक करे और शक्ति का सम्यक नियोजन भी करते रहे।

आचार्य ने इस अवसर पर मुनि सुमेरमल 'लाडनूं' (वर्तमान मंत्री मुनि), मुनि सोहनलाल चाड़वास, मुनि पानमल, मुनि ऋषभ कुमार, साध्वी विमल प्रज्ञा, साध्वी शुभ्र यशा आदि साधु-साध्वियों के स्नेह, वात्सल्य, समर्पण व सेवा भावना का उल्लेख किया।

प्रवचन के दौरान ही आचार्य ने अपने दीक्षा-प्रदाता मंत्री मुनि की चरण-वंदना कर समुचित जनमेदनी को गद्-गद् कर दिया। यह नजारा देख पूरा परिसर ऊं अर्हम की ध्वनि के साथ अपने आराध्य के प्रति नतमस्तक हो गया।

साध्वी कनकप्रभा ने कहा कि आज का दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। युवा नाम नई ऊर्जा, उत्साह, नए सपनों व नई उम्मीदों का है। युवा पीढ़ी हमारे समाज का भविष्य है। युवकों में जो चेतना जज्बा है उससे वह नया काम व इतिहास रच सकते हैं।

मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि भारतीय संस्कृति में ऊध्र्वगति बनने का संकल्प दीक्षा है। जैन दर्शन में भी दीक्षा शब्द का बड़ा महत्व है। इस युग में जिस व्यक्ति के मन में दीक्षा की भावना आ जाती है और वह दीक्षा ले लेता है तो वह इस युग का लाभ उठा लेता है। मुख्य नियोजिका साध्वी विश्रुत विभा ने कहा कि दीक्षा का अर्थ है प्रति स्त्रोत में गमन करना और आचार्य ने भी प्रतिस्त्रोतगामी बनकर अपने दीक्षा जीवन को सार्थक बनाया है। आचार्य के सह दीक्षित मुनि उदित कुमार ने भी अपने भाव व्यक्त किए।

कार्यक्रम के प्रारंभ में मुनि विजयकुमार ने 'वंदे गुरुवरम' मुनि राजकुमार ने 'आरती उतारां म्हे तो अंतर्यामी आपकी', साध्वी केवलयशा ने संयम की ओढ़ चदरिया, साध्वी कमलश्री ने 'अलौकिक महाश्रमण महा संत' तथा साध्वी वृंद की ओर से 'ओढ़ी बहु मोली चादर' गीत के द्वारा आचार्य की अभ्यर्थना की। साध्वी स्वस्ष्कि प्रभा ने संस्कृत भाषा में अभिव्यक्ति दी। साध्वी वंदना श्री, मुनि धन्य कुमार, साध्वी संगीत प्रभा, साध्वी मीमांसा प्रभा, साध्वी सुषमा कुमारी, साध्वी तरुण यशा में भावोद्गारित किए।

साध्वी जिन प्रभा ने कविता के द्वारा भावाभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम के अंत में अभा तेयुप के सहमंत्री हनुमान लूंकड़ ने युवा दिवस के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन मुनि दिनेश कुमार ने किया।

भावना की भावना साकार, दीक्षा की घोषणा

आचार्य ने मुमुक्षु बहन भावना की साध्वी दीक्षा की भावना को ध्यान में रखते हुए 5 नवंबर (कार्तिक कृष्णा षष्ठमी) को जसोल में दीक्षा देने की घोषणा की।