जसोल,२९.०७.१२. आचार्य महाश्रमण ने श्रद्धा के साथ ज्ञान का होना महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि श्रद्धा एक प्रकार की गाय है जो ज्ञान रूपी खूंटे से बंधी होने पर एक जगह रह सकती है। ज्ञान के खूंटे से नहीं बांधने पर श्रद्धा एक से दूसरे पर जा सकती है। इसलिए श्रद्धा का आधार ज्ञान है। आचार्य ने कहा कि हमारा श्रावक समाज ज्ञान की दृष्टि से गरीब नहीं है। श्रावकों को जितना अनुकूल समय मिले, स्वाध्याय करना चाहिए। उन्होंने अखिल भारतीय महिला मंडल की प्रशंसा करते हुए महासभा की ओर से संचालित ज्ञानशाला, उपासक श्रेणी को धर्मसंघ का एक सुंदर उपक्रम बताया। उन्होंने कहा कि जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय भी शिक्षा का अच्छा माध्यम है। आचार्य ने श्रावक शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि श्र का अर्थ है श्रद्धा का प्रतीक, व का अर्थ विवेक और क का अर्थ है क्रिया। श्रावक में विवेक रहना चाहिए। विवेक धर्म है। आचार्य ने मितव्ययता की प्रेरणा देते हुए कहा कि श्रावक समाज अनावश्यक फिजूलखर्ची न करे। धार्मिक संस्थानों में भी फिजूल खर्चे को रोके। अधिवेशनों, सम्मेलनों में मितव्ययता रखें। सामान्य किट से काम चल जाता है तो इसमे...