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Showing posts with the label Pravchan Video

Aacharya Mahashraman Pravchan 16.08.12 to 19.08.12

Aacharya Mahashraman Pravchan 16.08.12 to 19.08.12   19.08.12. 18.08.12. 17.08.12. 16.08.12.

Acharya Mahashramn Pravchan Video 15.08.12

तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिनायक अनुशास्ता आचार्य महाश्रमण जी का १५ अगस्त,२०१२ को जसोल चातुर्मास के दौरान का प्रवचन वीडियो.

Aacharya Mahashraman Pravachan 14 Aug 12

Terapanth Aacharya Mahashraman Pravachan 14 Aug 12 from Jasol.

Acharya Mahashraman Pravchan Video 12.08.12

आचार्य महाश्रमण जी प्रवचन वीडियो १२ अगस्त २०१२

Aacharya Mahashraman Pravachan 11 Aug 12

Aacharya Mahashraman Pravachan 10 Aug 12

Acharya Mahashraman Pravchan 01 Aug - 08 Aug 2012

Acharya Mahashraman pravchan video series : 01-08-2012 to 08-08-2012 Aacharya Mahashraman Pravachan 8 Aug 2012 Jasol   Aacharya Mahashraman Pravachan 7 Aug 2012 Jasol Aacharya Mahashraman Pravachan 6 Aug 2012 Jasol   Aacharya Mahashraman Pravachan 5 Aug 2012 Jasol Aacharya Mahashraman Pravachan 4 Aug 2012 Jasol   Aacharya Mahashraman Pravachan 3 Aug 2012 Jasol Aacharya Mahashraman Pravachan 2 Aug 2012 Jasol Aacharya Mahashraman Pravachan 1 Aug 2012 Jasol  image

H.H. Acharya Mahashraman Pravchan Video 31.07.12

H.H. Acharya Mahashraman Pravchan Video 31.07.12

चारित्र आराधना आत्म-निग्रह का मार्ग: आ. महाश्रमण Pravchan Video 30.07.12

जसोल. ३०.०७.२०१२. आचार्य महाश्रमण ने अपने पावन पाथेय में फरमाया कि - चारित्र की आराधना से व्यक्ति आत्म-निग्रह कर सकता है, कर्मो के आगमन को रोक सकता है. श्रावक के लिए ज्ञान एवं विवेक के साथ साथ त्याग प्रत्याख्यान की चेतना भी होना आवश्यक है. श्रावक को बारह व्रतो को धारण कर चारित्र की आराधना करनी चाहिए. श्रावक यह मनोरथ भी रखे कि मैं भी कभी आजीवन सामयिक चारित्र अर्थात साधुत्व को स्वीकार करूँ.

श्रद्धा का आधार ज्ञान : आचार्य महाश्रमण 29.07.12 Pravchan Video

जसोल,२९.०७.१२. आचार्य महाश्रमण ने श्रद्धा के साथ ज्ञान का होना महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि श्रद्धा एक प्रकार की गाय है जो ज्ञान रूपी खूंटे से बंधी होने पर एक जगह रह सकती है। ज्ञान के खूंटे से नहीं बांधने पर श्रद्धा एक से दूसरे पर जा सकती है। इसलिए श्रद्धा का आधार ज्ञान है। आचार्य ने कहा कि हमारा श्रावक समाज ज्ञान की दृष्टि से गरीब नहीं है। श्रावकों को जितना अनुकूल समय मिले, स्वाध्याय करना चाहिए। उन्होंने अखिल भारतीय महिला मंडल की प्रशंसा करते हुए महासभा की ओर से संचालित ज्ञानशाला, उपासक श्रेणी को धर्मसंघ का एक सुंदर उपक्रम बताया। उन्होंने कहा कि जैन विश्व भारती विश्वविद्यालय भी शिक्षा का अच्छा माध्यम है। आचार्य ने श्रावक शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि श्र का अर्थ है श्रद्धा का प्रतीक, व का अर्थ विवेक और क का अर्थ है क्रिया। श्रावक में विवेक रहना चाहिए। विवेक धर्म है।  आचार्य ने मितव्ययता की प्रेरणा देते हुए कहा कि श्रावक समाज अनावश्यक फिजूलखर्ची न करे। धार्मिक संस्थानों में भी फिजूल खर्चे को रोके। अधिवेशनों, सम्मेलनों में मितव्ययता रखें। सामान्य किट से काम चल जाता है तो इसमे...

27 July 2012 Acharya Mahashraman Pravchan

Acharya Mahashraman from Veetrag Samavsaran, Jasol. Courtesy-terapanthinfo, Acharya Mahashraman Chaturmas Vyavstha Samiti, Jasol.

Acharya Mahashraman Pravchan 25.07.12

Acharya Mahashramn Pravchan 24.07.12

13 July 2012 Acharya Mahashraman Video Pravchan

अच्छे गुण लें, दुर्गुण छोडें : आचार्य जसोल १४जुलाइ २०१२ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो तेरापंथ शासन के 11वें आचार्य महाश्रमण ने कहा कि व्यक्ति गुणों के आधार पर साधु होता है और अवगुणों के आधार पर असाधु बन जाता है। उन्होंने कहा कि आदमी का लक्ष्य अच्छे गुणों को ग्रहण करने और दुर्गुणों को छोडऩे का होना चाहिए। व्यक्ति को लक्ष्य बनाकर सद्गुणों को चुन लेना चाहिए और उन्हें अपने भीतर स्थापित कर लेना चाहिए। एक-एक गुण को ग्रहण करके व्यक्ति अपने जीवन को घट को परिपूर्ण कर सकता है। आचार्य शुक्...रवार को जसोल में चातुर्मास प्रवचन के दौरान धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि साधु का लक्ष्य साधना व गुणों के विकास को होना चाहिए। दीक्षा पर्याय के बढऩे के साथ साधना भी परिपक्व तर होनी चाहिए। साधु कषायों को मंद कर, अशुभ योगों को बंद कर शुभ योग में रहने का प्रयास करें। सेवा है सिरमौर साधना आचार्य ने कहा कि संयम महाव्रत की साधना मूल बात है। उसके बाद साधु को स्वाध्याय, सेवा व ज्ञनाहार की तपस्या का भी प्रयास करना चाहिए। उससे ये तीनों न हो सके तो उपयुक्तता के आधार पर किसी एक का चयन तो करना ही चाहिए। आचा...

08 July 2012 Acharya Mahashraman Pravchan Video

06.07.12 Acharya Mahashraman Pravchan Video

05.07.12 Acharya Mahashraman Pravchan video

04.07.12 Acharya Mahashraman Pravachan Video

Acharya Mahashraman Pravchan and Video 14.05.12

बालोतरा आचार्य महाश्रमण ने धर्म की भावना को अनुप्रेक्षा बताते हुए कहा कि धर्म आत्मशुद्धि व आत्मकल्याण का मार्ग है। दान को धर्म की संज्ञा देते हुए आचार्य ने कहा कि गृहस्थ जीवन में रहने वाला शुद्ध साधु को सविधि दान देता है तो वह धर्म है। साधु को श्रद्धा के साथ दान देकर वह साधु की साधना में सहायक बनता है। इससे साधु के कर्म निर्जरा के साथ उस दान देने वाले के कर्मों की निर्जरा भी होती है। ये विचार आचार्य महाश्रमण ने सोमवार को नया तेरापंथ भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि किसी कारणवश या दूर-दराज के देशों में दान का लाभ नहीं मिलता है तो दान देने की भावना करना भी धर्म है।  आचार्य ने शील को धर्म का एक प्रकार बताते हुए कहा कि शील की साधना भी अपने आप में एक बड़ी साधना है। गृहस्थ को स्वदार व स्वपति संतोष रखना चाहिए। उन्हें अपने पति या पत्नी के अलावा परपुरुष या पराई स्त्री की कल्पना भी नहीं करनी चाहिए। साधु को तो यह साधना करनी अनिवार्य ही है पर गृहस्थ को भी यथासंभव प्रयास करना चाहिए। उन्होंने तपस्या के बारे में कहा कि तप के द्वारा प्राणी अपने कर...

Aacharya Mahashraman Pravchan Video 13.05.12

नैतिकता का महत्व उपासना से भी ज्यादा : आचार्य महाश्रमण आचार्य महाश्रमण ने 'व्यापार और सदाचार' विषय पर व्यापार में नैतिकता प्रामाणिकता रखने की प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यापार एक सेवा का माध्यम है। व्यापार के माध्यम से जनता के आवश्यकताओं की पूर्ति कर सेवा की जाती है और इस कार्य में व्यापारी वर्ग का भी बड़ा सहयोग रहता है। उन्होंने कहा कि बाजार में नैतिकता की देवी विराजमान रहे और व्यक्ति के व्यवहार में धार्मिकता रहनी चाहिए। जिस प्रकार मंदिरों आदि धार्मिक स्थलों पर गंदगी नहीं होने दी जाती, उसी प्रकार बाजार में भी अनैतिकता रूपी गंदगी को प्रश्रय नहीं देना चाहिए। आचार्य रविवार को नया तेरापंथ भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित कर रहे थे। आचार्य ने नैतिकता का महत्व उपासना से भी ज्यादा बताते हुए कहा कि नैतिकता की देवी बाजार में रहने पर ही जन सेवा कार्य व्यापारी द्वारा किया जा सकता है। उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि व्यापार में सदाचार रहना चाहिए। व्यापारी अर्थ का लोभ नहीं करके नैतिकता को व्यवहार स्थान दें। आचार्य ने शुद्ध पैसों का ही धार्मिक स्थानों में उपयोग करने की सल...